بِسْمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِيْمِ
مدحت کا تری مجھ کو ہے ارمان سکینہ!
لفظوں کے عطا کر مجھے مرجان سکینہ!
मिदहत का तेरी मुज़को है अरमान सकीना,
लफ़्ज़ों के अता कर मुज़े मरजान सकीना।
اعلا ہے ترے رتبے تری شان سکینہ!
بابا ہے ترا خلد کا سلطان سکینہ!
आला है तेरे रुत्बे तेरी शान सकीना,
बाबा है तेरा खुल्द का सुल्तान सकीना।
جنت سے بھی اعلا ترا ایوان سکینہ!
صدرہ سے بھی اونچا ترا دالان سکینہ!
जन्नत से भी आला तेरा अयवान सकीना,
सिद्रा से भी ऊँचा तेरा दालान सकीना।
لکھوں میں تری شان میں اک نوری قصیدہ،
ہو مشک تری میرا قلم دان سکینہ!
लिख्खूं मैं तेरी शान में एक नूरी क़सीदा
हो मश्क़ तेरी मेरा कलमदान सकीना।
مشکل ہے بہت تیری ثناء ثانیِ زہراء!
گر تیری عطا ہو تو ہے آسان سکینہ!
मुश्किल है बहोत तेरी सना सानीए ज़हरा,
गर तेरी अता हो तो है आसान सकीना।
سینے پہ تو شبیر کے سو جاتی تھی ایسے،
جیسے کہ ہو قرآن پہ قرآن سکینہ!
सीने पे तू शब्बीर के सो जाती थी ऐसे,
जैसे के हो क़ुरआन पे क़ुरआन सकीना।
پانی کے لیے دے دیے عباس نے بازوں،
غازی کی وفاؤں کا ہے دیوان سکینہ!
पानी के लिऐ दे दिये अब्बास ने बाजू,
गाज़ी की वफ़ाओं का है दिवान सकीना।
محفل ہو اگر نامِ علمدار سے منصوب،
اُس بزم کا رکھ دیجیے عنوان سکینہ!
मेहफ़िल हो अगर नामे अलमदार से मन्सूब,
उस बज़्म का रख दीजिए उन्वान सकीना।
کہ دینا مرے حال تو عباس چچا کو،
دکھ درد کا مل جایگا درمان سکینہ۔
केह देना मेरे हाल तू अब्बास चचा को,
दुःख दर्द का मील जाएगा दरमान सकीना।
مجھ پر بھی کرم کی ہو نظر شاہ کی بیٹی!
اک روز بنو آپ کا مہمان سکینہ!
मुज़ पर भी करम की हो नज़र शाह की बेटी,
एक रोज़ बनूँ आपका मेहमान सकीना।
اشکوں سے ترے خلق کیے جگنوں جہاں کے،
یوں اجر تجھے دیتا ہے یزدان سکینہ!
अश्कों से तेरे ख़ल्क़ किए जुगनूँ जहाँ के,
यूँ अज्र तुज़े देता है यज़दान सकीना।
مومن خادم حسین کلیم ولٹوا
मोमिन ख़ादिमहुसैन "कलीम" वलेटवा।
مدحت کا تری مجھ کو ہے ارمان سکینہ!
لفظوں کے عطا کر مجھے مرجان سکینہ!
मिदहत का तेरी मुज़को है अरमान सकीना,
लफ़्ज़ों के अता कर मुज़े मरजान सकीना।
اعلا ہے ترے رتبے تری شان سکینہ!
بابا ہے ترا خلد کا سلطان سکینہ!
आला है तेरे रुत्बे तेरी शान सकीना,
बाबा है तेरा खुल्द का सुल्तान सकीना।
جنت سے بھی اعلا ترا ایوان سکینہ!
صدرہ سے بھی اونچا ترا دالان سکینہ!
जन्नत से भी आला तेरा अयवान सकीना,
सिद्रा से भी ऊँचा तेरा दालान सकीना।
لکھوں میں تری شان میں اک نوری قصیدہ،
ہو مشک تری میرا قلم دان سکینہ!
लिख्खूं मैं तेरी शान में एक नूरी क़सीदा
हो मश्क़ तेरी मेरा कलमदान सकीना।
مشکل ہے بہت تیری ثناء ثانیِ زہراء!
گر تیری عطا ہو تو ہے آسان سکینہ!
मुश्किल है बहोत तेरी सना सानीए ज़हरा,
गर तेरी अता हो तो है आसान सकीना।
سینے پہ تو شبیر کے سو جاتی تھی ایسے،
جیسے کہ ہو قرآن پہ قرآن سکینہ!
सीने पे तू शब्बीर के सो जाती थी ऐसे,
जैसे के हो क़ुरआन पे क़ुरआन सकीना।
پانی کے لیے دے دیے عباس نے بازوں،
غازی کی وفاؤں کا ہے دیوان سکینہ!
पानी के लिऐ दे दिये अब्बास ने बाजू,
गाज़ी की वफ़ाओं का है दिवान सकीना।
محفل ہو اگر نامِ علمدار سے منصوب،
اُس بزم کا رکھ دیجیے عنوان سکینہ!
मेहफ़िल हो अगर नामे अलमदार से मन्सूब,
उस बज़्म का रख दीजिए उन्वान सकीना।
کہ دینا مرے حال تو عباس چچا کو،
دکھ درد کا مل جایگا درمان سکینہ۔
केह देना मेरे हाल तू अब्बास चचा को,
दुःख दर्द का मील जाएगा दरमान सकीना।
مجھ پر بھی کرم کی ہو نظر شاہ کی بیٹی!
اک روز بنو آپ کا مہمان سکینہ!
मुज़ पर भी करम की हो नज़र शाह की बेटी,
एक रोज़ बनूँ आपका मेहमान सकीना।
اشکوں سے ترے خلق کیے جگنوں جہاں کے،
یوں اجر تجھے دیتا ہے یزدان سکینہ!
अश्कों से तेरे ख़ल्क़ किए जुगनूँ जहाँ के,
यूँ अज्र तुज़े देता है यज़दान सकीना।
مومن خادم حسین کلیم ولٹوا
मोमिन ख़ादिमहुसैन "कलीम" वलेटवा।