بِسْمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِيْمِ
सब कत्ल हुए
शामें गरीबाका समां है
तन्हा,गरीब जयनबे मुजतरकी फुगां है।
में क्या करूँ
अम्मां, भाई न रहा मेरा, ज़यनब उजड़ गई ।
दुश्वार है
जीना, परदेशमें मेरा, ज़यनब उजड़ गई ।
1
परदेश में वो
छोड़ गया मुझको अकेला
भाई जो मेरे
सर पे था इक बाप की तरहा
जलती हुई रेती
पे पड़ा उसका है लाशा
वीरान हुवा
साहिबे तत्हीर का ख़ैमा
छूटा वो सहारा,
में हो गई तन्हा…. ज़यनब उजड़ गई ।
2
पानी के बिना
छाले पड़े हाये दहन में
गेहरे थे कईं
घांव तो भाई के बदन में
शब्बीर का सर
तन से जुदा हो गया रन में
चादर भी नहीं
सर पे उसे क्या दु कफन में
जंगल मे भरा
घर,
सब लूट गया मेरा…. ज़यनब उजड़ गई ।
3
क्या तुमको
मेरे हाल का अहेसास नहीं है
ज़यनब है हुई
तन्हा कोई पास नहीं है
पर्दे का
मुहाफ़िज़ मेरा अब्बास नहीं है
ज़यनब को तेरी
जीने की अब आस नहीं है
किस तरह में
जाऊं यसरब मे दुबरा…. ज़यनब उजड़ गई ।
4
वो अस्र का
हंगाम क़यामत की घड़ी थी
नरगे में
सितमगारों के ज़हरा की कली थी
टिले पे खड़ी
में ये समां देख रही थी
गरदन पे मेरे
भाई के ज़ालिम की छुरी थी
वो शिम्र का
खंजर वो भाई का सजदा… ज़यनब उजड़ गई ।
5
रौनक थी अजब
दश्ते बयाबां की सहर में
थे सुबहे दहम
क़ासिमो अब्बास भी घर मे
अब खाके सिनां
सोया है अकबर भी जिगर में
अय अम्मां नही
कोई भी अब ज़िंदा नज़र में
मकतल की उदासी
करती है ये नौहा…. ज़यनब उजड़ गई ।
6
ज़ालिम ने सब
असबाब लुटे ख़ैमे जलाएं
नन्ही सी
सकीना को तमाचे भी लगाएं
जलते हुवे
दामन है हरम अपने उठाएं
करबल के
बयाबां में कहाँ सर को छुपाएं
तारीकियां बन
की देती है दिलासा…. ज़यनब उजड़ गई ।
7
परदेश में
लाचार है औलादे पयम्बर
बे गोरो कफन
लाशें निगाहों में बहत्तर
मकतल में बुका
करती है ये ज़ैनबे मुज़तर
अय अम्मां ज़रा
देखो क़यामत का ये मंज़र
जलते हुवे
ख़ैमे जलता हुवा सहेरा…. ज़यनब उजड़ गई ।
8
सर जुकने नही
देती मसायब में भी गैरत
लाशों के
समनदर में "कलीम" बीबी की हिम्मत
नज़रों से
टपकती वो बयाबान कि हैबत
कैसे हो बयां
ज़ैनबे मज़लूम की गुरबत
"मोहसीन" का है पुरसा पुरदर्द ये नौहा …. ज़यनब उजड़ गई ।
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