फूल एक और आया पंजेतनके गुलशनमें
सानीए बतूल आई मुर्तज़ाके आंगनमें
जबसे मेरे अकबरका हुस्न उसने देखा है
चाँद छुपके बैठा है बादलोकी चिल्मनमें
जब कदम रखा होगा बावफाने दरिया पर
आग लग गई होगी अल्कमाके तन-मनमें
रख न दे कही आबिद तख्तको उलट करके
इसलिए ही बांधा था जंजीरोके बंधनमें
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