अंबियासे भी है बढ़कर मर्तबा शब्बीरका
साथ अहमदके सना ख्वां है खुदा शब्बीरका
बालो पर फितरूसको और राहिबको देता है पिसर
है खुदाकी वो मशिय्यत फैंसला शब्बीरका
दोशे अहमद पर सवारी करनेवाला एक वो
जाते अहमद, जिस तरफ दिल चाहता शब्बीरका
ईदके दिन चाहे कपड़े तो फिर उसके वास्ते
खुल्दका रिज़वान दरजी बन गया शब्बीरका
अंबियाके सारे सजदोंको बका उससे मिली
एक सजदा उनके सजदोंमें मिला शब्बीरका
सर बहत्तरके जो बोये करबलाकी खाकमें
गुल मुकम्मल दीनका तब म्हेंक उठा शब्बीरका
आज भी इंसानियतका मिल रहा हमको सबक
मकतले शेह था न वो था मकतबा शब्बीरका
दर जो सारे बंद थे बाबे मशिय्यत खुल गए
वास्ता मैने उन्हें जब भी दिया शब्बीरका
करबला वीरान थी बस बागबां तबसे हुई
बस मोहर्रम पहोंचा सारा काफला शब्बीरका
दीने अहमद रूहका प्यासा रहा तेरे बगैर
बुझ गई दीं की अतश जब खूं मिला शब्बीरका
जी रहा है अय मुसलमां तू जो इतने चैनसे
शुक्र तू हर हालमें करना अदा शब्बीरका
अय यज़ीदे वक्त तेरा हुरमला तुझको नसीब
हमको अपनी नस्लमें है हुर मिला शब्बीरका
ये मयारे दीने अहमद ज़ुक नहीं शकता कभी
जज़्बा है बेशीरका और होंसला शब्बीरका
की है क्या तफ़्सीर तूने "फज़्कुरूनी"की बता?
है कसीदाख़्वान कुरआंमें खुदा शब्बीरका
करबलाकी खाक अय खाके शिफा तुझको सलाम
तुझपे ही रबका वो घर, रोज़ा हुआ शब्बीरका
एक सजदा करबलामें उसने ऐसा कर दिया
तबसे आशिक हो गया है किब्रिया शब्बीरका
दो ही सजदोंसे हुआ है सुर्खरुं दीने नबी
एक सजदा है अलीका दूसरा शब्बीरका
इस सनाए आले अहमदमें नहीं मेरा कमाल
होता है हर लफ्ज़ और हर काफिया शब्बीरका
शानमें इनके ही उतरा पढ़के कुरआं देख ले
हलअता और इन्नमा और माएदा शब्बीरका
बोलता है वो वही होती है जो रबकी वही
किब्रियाका सोचना है सोचना शब्बीरका
हकका और तौहीदका मतलब अता मुझको हुआ
है किया मैने कभी जो तरजुमा शब्बीरका
चैन मिलता ही न था अब इसलिए मेरा नबी
सूरते अकबरमें फिर बेटा बना शब्बीरका
दौरे मूसा है अगर शब्बीर तो फिर दोस्तो
बावफा अब्बास मौला है असा शब्बीरका
हक अदा करना "अलिफ" तुम मरते दम तक इस तरह
खूबतर महेशरमें पाएगा सिला शब्बीरका
मर्तबा हुर सा मिलेगा आज है यौमे नजात
लिख कसीदा अय "कलीमे करबला" शब्बीरका
है यकीं मुझको "कलीम"भी होगा ज़व्वारे हुसैन
दे रहा है ये "अलिफ" जब वास्ता शब्बीरका
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