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શુક્રવાર, 24 એપ્રિલ, 2020

तजमिन दर कलाम पीर सैयद जहीर हुसैन जाफरी (रहे.)

मिदहते मुश्किल कुशामें मैं जरी बनता गया
हर घड़ी फ़िक्रे जहांसे सरसरी बनता गया
मज़हरे नूरे खुदाका मज़हरी बनता गया
बादए हुब्बे अलीसे कौसरी बनता गया
में अदाके कंबरीसे हैदरी बनता गया

लामकांका जो मकां, उसका मकां मेरा मकां
कौन हुँ क्या हुँ, नहीं होता है ये सब पर अयां
जिसपे भी हुँ मैं अयां वो ख़िज़्र या पीरो जवां
अहलेमंज़िलने बनाया मुझको मीरे कारवां
नक्शे पा मेरा चरागे रहबरी बनता गया

अय सवाली! युं न अपना सर पटकना दरबदर
मांग ले दुनिया दुआए होंगी ना वो बेअसर
सुन ले दुनिया! मैं तबारे जाफरीका हुँ कमर
ज़ुकते जाते है मेरे दर पर जहांके ताजवर
फक्र मेरा नाजिसे सद कैसरी बनता गया

मिम्बरे हम्दे खुदाका हुँ अज़लसे शाहसवार
फर्श पा, चर्खे बरीं पर है मेरा इज़्ज़ो वकार
हर सुखन हुब्बे अलीमें पहोंचे सूए किर्दिगार
जिस तरफ उठती रही मेरी निगाहे नूरबार
ज़र्रा ज़र्रा आफताबे खावरी बनता गया

शम्स वो चर्खे सुखनका जिसको ना आये ज़वाल
मेरे हर अफ्कारमें हो यारका मेरे जमाल
हर सुख़नवर इस जहांका देख ले मेरा कमाल
क्या मिले दुनियामें मेरी खुशमिकालीकी मिशाल
हर सुखन मेरा नवाए दिलबरी बनता गया

हर ज़मानेमें फकत मेरी रही है रहबरी
माशुके हैदर हुँ मैं और बात कहता हुँ खरी
देखकर मुझको उन्हें याद आये मंज़र खैबरी
रूसियाह होते रहे है मरहबीओ अंतरी
सुर्खरू लेकिन हंमेशा हैदरी बनता गया

बात सुन ले आखरी मेरी "कलीमे करबला"
बस अलीका इश्क ही इश्के नबी इश्के खुदा
गर न आये जहेनमें तो देख ले मकता मेरा
रोज़ अफज़ु जज़्बए इश्के अलीए मुर्तजा
मायए फख्रे ज़हीरे जाफरी बनता गया

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